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अगर मातृत्व एक क्रिया हो

असहमति को संपादकीय पद्धति बनाना

कैफ़े डिसेंसस स्वयं को असहमति के लिए समर्पित मंच के रूप में प्रस्तुत करता है। इसका नाम ही संकेत देता है कि यहाँ विचारों के अंतर को दबाने के बजाय उन्हें सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनाया जाता है। पत्रिका के विभिन्न अंकों में साहित्य, समाज और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेख, कविताएँ और संपादकीय प्रकाशित होते हैं। इसके ऑनलाइन ढाँचे में नए लेख, योगदानकर्ताओं की जानकारी, संपादकीय मंडल, घोषणाएँ, पुराने अंक और लेख भेजने से संबंधित सामग्री के लिए अलग-अलग विभाग हैं। इस तरह पाठक किसी एक आलेख तक सीमित न रहकर विषय पर बने व्यापक संवाद को देख सकता है।

इस संपादकीय दृष्टि का स्पष्ट उदाहरण उनहत्तरवाँ अंक है, जिसका विषय है—मातृत्व की दूसरी कल्पनाएँ। अंक मातृत्व को केवल जैविक अनुभव या सभी स्त्रियों के लिए अनिवार्य जीवन-लक्ष्य मानने वाली धारणा पर सवाल उठाता है। इसमें संपादकीय, संस्मरण, कविता और साहित्यिक विश्लेषण जैसे अलग-अलग रूप शामिल हैं। विविध विधाओं का यह संयोजन महत्त्वपूर्ण है: मातृत्व पर चर्चा सिर्फ़ सिद्धांतों से नहीं, बल्कि निजी अनुभव, सामाजिक संरचना और कल्पना में उसके चित्रण से भी आगे बढ़ती है।

अंक का केंद्रीय प्रश्न मातृत्व की कोई एक परिभाषा तय करना नहीं, बल्कि यह देखना है कि प्रचलित परिभाषा किन लोगों और अनुभवों को बाहर छोड़ देती है। जिनके जीवन में बच्चे नहीं हैं, जिन्होंने गोद लेने का रास्ता चुना है, या जो पारंपरिक माँ-बेटी संबंधों से अलग अनुभव रखते हैं—उनकी आवाज़ें भी चर्चा का हिस्सा बनती हैं। इससे मातृत्व को एक स्थिर पहचान के बजाय संबंधों, जिम्मेदारियों और चुनावों के रूप में समझने की गुंजाइश पैदा होती है।

जैविक रिश्ते और अभिभावकत्व के विकल्प

परोमिता सेनगुप्ता का संपादकीय प्रजनन और परिवार की धारणाओं को एक कठिन सवाल के सामने रखता है: जब दुनिया में लाखों बच्चों को परिवारों की आवश्यकता है, तो प्रयोगशाला में मनचाहे गुणों वाले शिशु बनाने की इतनी तीव्र इच्छा क्यों है? यह प्रश्न विज्ञान का विरोध भर नहीं है। इसके ज़रिये संपादकीय पूछता है कि प्रजनन की तकनीकी क्षमता को सामाजिक प्राथमिकता मानने से पहले बच्चों की ज़रूरतों और परिवार बनाने के अन्य रास्तों पर कितना विचार किया जाता है।

कमला भसीन का संस्मरण इस विमर्श को निजी जीवन के स्तर पर लाता है। वह लिखती हैं कि वह और उनके साथी छह वर्षों से अधिक समय से एक-दूसरे को जानते थे, लेकिन उन्होंने बच्चा पैदा करने पर गंभीर बातचीत नहीं की थी। दोनों में माता-पिता बनने की प्रबल सहज इच्छा नहीं थी; कभी बच्चों वाले परिवारों को देखकर यह विचार अच्छा लगता, पर वह इतना निर्णायक नहीं था कि जीवन की दिशा बदल दे। काम उनके जीवन को व्यस्त और संतोषजनक बनाए हुए था। यह अनुभव उस धारणा को चुनौती देता है कि हर जोड़े की इच्छा स्वाभाविक रूप से संतान तक पहुँचेगी।

यहाँ चुनाव का अर्थ किसी एक रास्ते को सही घोषित करना नहीं है। मुद्दा यह है कि बच्चा चाहने, न चाहने, जन्म देने या गोद लेने के फैसलों को सामाजिक दबाव से अलग रखकर देखा जाए। अंक के लेख इन सवालों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं: परिवार किसे कहते हैं, देखभाल की जिम्मेदारी किस पर आती है और क्या माता-पिता बनने की इच्छा को जीवन की सफलता का पैमाना मानना उचित है? इस चर्चा की संपादकीय बनावट और पुराने अंकों तक पहुँचने की सुविधा को https://www.cafedissensus.net/ के रूप में पहचाने जाने वाले कैफ़े डिसेंसस के प्रकाशन-मंच के संदर्भ में समझा जा सकता है।

‘माँ’ पहचान नहीं, देखभाल की क्रिया भी

अनुराधा मजूमदार का लेख ‘अन्य माताओं’ की अवधारणा को लैंगिक सीमाओं से जोड़कर देखता है। राष्ट्रीय समाचार माध्यमों में चर्चा पाए आदित्य की प्रेरक कहानी के संदर्भ में लेख “माँ” को केवल स्त्री के लिए प्रयुक्त संज्ञा मानने के बजाय देखभाल की क्रिया के रूप में समझने की आवश्यकता रेखांकित करता है। इस बदलाव से सवाल उठता है कि बच्चे के जीवन में पालन-पोषण, सुरक्षा और भावनात्मक सहारा देने वाले व्यक्ति को पहचानने के लिए क्या मातृत्व को स्त्री शरीर से ही बाँधना ज़रूरी है।

यह विचार मातृत्व की सामाजिक प्रतिष्ठा को कम नहीं करता, बल्कि देखभाल को एक व्यापक मानवीय जिम्मेदारी के रूप में देखने का आग्रह करता है। जब “माँ” का अर्थ केवल जन्म देने वाली स्त्री तक सीमित होता है, तब दूसरे अभिभावकों और परिवार के वैकल्पिक रूपों की भूमिका अस्पष्ट रह जाती है। लेख की दृष्टि में मातृत्व को क्रिया की तरह देखने से उन संबंधों को भाषा मिल सकती है जो पारंपरिक नामकरण में जगह नहीं पाते।

अंक की कविताएँ भी शरीर और सार्वजनिक जीवन के अनुभवों की ओर ध्यान खींचती हैं। पॉलामी सेनगुप्ता की दो कविताओं में मेट्रो और लिफ़्ट जैसे रोज़मर्रा के स्थान आते हैं। उनमें पसीने से भीगी हथेली और करीने से इस्त्री किए कपड़ों के बीच का विरोधाभास स्त्री शरीर पर सामाजिक निगाह का संकेत देता है। कविता यहाँ मातृत्व पर सीधे तर्क नहीं देती, लेकिन स्त्री होने के सार्वजनिक अनुभव को सामने रखती है—वह अनुभव जिसके भीतर शरीर, अपेक्षा और आत्म-अभिव्यक्ति लगातार एक-दूसरे से टकराते हैं।

कथा और आलोचना में रिश्तों की जटिलता

बार्शा मंडल का लेख डिज़्नी की फ़िल्म ‘टैंगल्ड’ में गोद लेने और अपहरण के बीच की उलझन पर केंद्रित है। रॅपन्ज़ेल और गॉटल के संबंध को पढ़ते हुए लेख दिखाता है कि केवल “माँ” कहलाना किसी रिश्ते को प्रेमपूर्ण या सुरक्षित नहीं बना देता। रॅपन्ज़ेल का यह पूछना कि क्या उसे गॉटल को माँ कहना भी चाहिए, संबंध के नाम और उसके वास्तविक व्यवहार के बीच की दूरी उजागर करता है। यहाँ मातृत्व की पहचान को अधिकार के रूप में नहीं, देखभाल और संबंध की गुणवत्ता के आधार पर परखा जाता है।

स्रेय मुखर्जी का लेख चिनामांडा न्गोज़ी आदिची की २०२० में प्रकाशित लघुकथा ‘ज़िकोरा’ के माध्यम से समकालीन मातृत्व की पेचीदगियों पर विचार करता है। लेख के अनुसार, जीवन के अनेक क्षेत्रों में स्त्रियों की उपलब्धियों के बावजूद मातृत्व से जुड़े कठिन प्रश्न समाप्त नहीं हुए हैं। कथा-साहित्य इन तनावों को अनुभव की बारीकी से देखने का अवसर देता है—जहाँ व्यक्तिगत निर्णय सामाजिक अपेक्षाओं, संबंधों और बदलती परिस्थितियों के बीच आकार लेते हैं।

पृथ्वीजीत सिन्हा का ‘मातृत्व की संरचना’ शीर्षक लेख इस विषय का अधिक कठोर सामाजिक पक्ष सामने लाता है। उसमें प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु-दर, बच्चे पालने के मोड़ पर स्त्रियों की भूमिकाओं के सीमित हो जाने और अपने शरीर पर नियंत्रण की कमी का उल्लेख है। यह दृष्टि मातृत्व को केवल निजी स्नेह या परिवार की खुशी के रूप में प्रस्तुत नहीं करती; वह उन परिस्थितियों की भी पड़ताल करती है जिनमें देखभाल का श्रम और शारीरिक जोखिम असमान रूप से स्त्रियों पर पड़ते हैं।

चंद्रकला घोष का लेख मनोविश्लेषक युंग के आद्यरूपों की मदद से पारंपरिक माँ-बेटी संबंधों पर विचार करता है। इस तरह अंक साहित्यिक पात्रों और मनोवैज्ञानिक अवधारणाओं को सामाजिक बहस से जोड़ता है। अलग-अलग लेख एक ही निष्कर्ष दोहराने के बजाय मातृत्व के अलग पहलुओं—इच्छा, गोद लेना, लिंग, शरीर, कथा और देखभाल—को सामने रखते हैं।

उनहत्तरवें अंक की खासियत यह है कि वह मातृत्व पर अंतिम फैसला सुनाने की कोशिश नहीं करता। वह पाठक को यह जाँचने का अवसर देता है कि “अच्छी माँ” या “स्वाभाविक परिवार” जैसी धारणाएँ किन अनुभवों से बनी हैं और किन्हें अनदेखा करती हैं। कैफ़े डिसेंसस की असहमति-आधारित संपादकीय दिशा इसी बहुलता में दिखाई देती है: निजी संस्मरण, कविता और आलोचना साथ रखकर पत्रिका मातृत्व को एक ही साँचे में बाँधने के बजाय उसके बदलते अर्थों पर संवाद खोलती है।